रफ्ता रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए
पहले जान फिर जाने जाँ फिर जाने जाना हो गए
दिन बदीन बढ़ती गयी इस हुस्न की रानाईयाँ
पहेले गुल फिर गुल बदन फिर गुल बदामा हो गए
आप तो नजदीक से नजदीक तर आते गए
पहले दिल फिर दिलरुबा फिर दिल के मेहमाँ हो गए
प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ़ मिट गए
आप से फिर तुम हुए फिर तू का उन्वां हो गए ||
गजल sung by Mehadi hassan .. Poet - no idea....
मनोज
Labels: शेर -ओ - शायरी

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