ये तबियत जो मेरी सच पे अडी ना होती
कोई सूली मेरी चौखट पे गडी ना होती ||
सूनी आँगन में मेरी माँ खडी ये सोचती है
अच्छा होता कि औलाद मेरी बड़ी ना होती ||
कैसे करता मैं यकीं तेरी खुदाई पर
मेरी कश्ती जो तूफां मे फसी ना होती ||
- Unknown
Labels: शेर -ओ - शायरी

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