तन्हाई
रात ढले जब तन्हाई
अपने घर को जाती है
जब दूर कहीं कोई शहनाई
वही प्रेम गीत द्होराती है
जब नींद मेरी इन आँखों से
कोसों दूर चली जाती है
तब याद तुम्हारी आती है..
तब याद तुम्हारी आती है..
जब सूरज कि किरण तकिये से
सुबह जब सर अपना उठाती है
और कोई घडी मेरे कमरे कि
वक्त पूरे सात बजाती है
जब चाय कि प्याली छन से गिर
एक लम्हे में बिखर जाती है
जब कार कि चाबी इतने सवेरे
जाने कहाँ चली जाती है.?
तब याद तुम्हारी आती है...
जब धीरे धीरे चलती हवा
एक लम्हे को रूक जाती है
जब बेल लता किसी पेड़ से लिपट कर
झुक जाती है, सिमट जाती है
जब भंवरा बन में आता है
और फिर कोई कली मुस्काती है
तब याद तुम्हारी आती है
तब याद तुम्हारी आती है
जब जाते सूरज कि किरणें
कई रंगों में बदल जाती हैं
जब पंछियों कि लंबी कतारें
दूर गगन उड़ जाती हैं
जब दिन की थकान मेरी रूहों मैं
लम्हा लम्हा घुल जाती है
जब मैं अपने "मकान" आता हूँ
और दुनिया "घर" को जाती है
तब याद तुम्हारी आती है
ऐसे आलम में उफ़ ये तन्हाई
जब रुप तेरा लिए चली आती है
वो हंसी, वो इठलाना, वो इतराना
बस पहरों रात जगाती है...
मैं उस को भी खूब चाहता हूँ
वह भी तो मुझे बहुत चाहती है..
तब याद तुम्हारी आती है..
तब याद तुम्हारी आती है...
(C)Shahid Sayed, Nov. 4th, 2007@ १९००
लिंक: http://jebroni.blogspot.com/

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