Wednesday, October 24, 2007

ये तबियत जो मेरी सच पे अडी ना होती
कोई सूली मेरी चौखट पे गडी ना होती ||
सूनी आँगन में मेरी माँ खडी ये सोचती है
अच्छा होता कि औलाद मेरी बड़ी ना होती ||
कैसे करता मैं यकीं तेरी खुदाई पर
मेरी कश्ती जो तूफां मे फसी ना होती ||

- Unknown

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Tuesday, October 23, 2007

रफ्ता रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए
पहले जान फिर जाने जाँ फिर जाने जाना हो गए

दिन बदीन बढ़ती गयी इस हुस्न की रानाईयाँ
पहेले गुल फिर गुल बदन फिर गुल बदामा हो गए

आप तो नजदीक से नजदीक तर आते गए
पहले दिल फिर दिलरुबा फिर दिल के मेहमाँ हो गए

प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ़ मिट गए
आप से फिर तुम हुए फिर तू का उन्वां हो गए ||

गजल sung by Mehadi hassan .. Poet - no idea....

मनोज

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