Friday, May 02, 2008

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
जिंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी

हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की जीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की जीनत

जिंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शम्मा से हो मुझको मोहब्बत या रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्दमंदों से जईफों से मोहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको

Artist: Jagjit Singh
Album: Cry For Cry

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Tuesday, November 20, 2007

तन्हाई

रात ढले जब तन्हाई
अपने घर को जाती है
जब दूर कहीं कोई शहनाई
वही प्रेम गीत द्होराती है
जब नींद मेरी इन आँखों से
कोसों दूर चली जाती है
तब याद तुम्हारी आती है..
तब याद तुम्हारी आती है..

जब सूरज कि किरण तकिये से
सुबह जब सर अपना उठाती है
और कोई घडी मेरे कमरे कि
वक्त पूरे सात बजाती है
जब चाय कि प्याली छन से गिर
एक लम्हे में बिखर जाती है
जब कार कि चाबी इतने सवेरे
जाने कहाँ चली जाती है.?
तब याद तुम्हारी आती है...

जब धीरे धीरे चलती हवा
एक लम्हे को रूक जाती है
जब बेल लता किसी पेड़ से लिपट कर
झुक जाती है, सिमट जाती है
जब भंवरा बन में आता है
और फिर कोई कली मुस्काती है
तब याद तुम्हारी आती है
तब याद तुम्हारी आती है

जब जाते सूरज कि किरणें
कई रंगों में बदल जाती हैं
जब पंछियों कि लंबी कतारें
दूर गगन उड़ जाती हैं
जब दिन की थकान मेरी रूहों मैं
लम्हा लम्हा घुल जाती है
जब मैं अपने "मकान" आता हूँ
और दुनिया "घर" को जाती है
तब याद तुम्हारी आती है


ऐसे आलम में उफ़ ये तन्हाई
जब रुप तेरा लिए चली आती है
वो हंसी, वो इठलाना, वो इतराना
बस पहरों रात जगाती है...
मैं उस को भी खूब चाहता हूँ
वह भी तो मुझे बहुत चाहती है..

तब याद तुम्हारी आती है..
तब याद तुम्हारी आती है...

(C)Shahid Sayed, Nov. 4th, 2007@ १९००
लिंक: http://jebroni.blogspot.com/

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Thursday, November 15, 2007

अश्क

अश्क आँखों से निकलना बेवज़ह होता नहीं,
आह निकली है तो दिल में दर्द भी होगा कहीं.

गर मेरी खामोशियों को तुम समझ पाते नहीं,
तो मेरे अल्फाज़ का भी कुछ असर होगा नहीं।

-Unknown

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Wednesday, October 24, 2007

ये तबियत जो मेरी सच पे अडी ना होती
कोई सूली मेरी चौखट पे गडी ना होती ||
सूनी आँगन में मेरी माँ खडी ये सोचती है
अच्छा होता कि औलाद मेरी बड़ी ना होती ||
कैसे करता मैं यकीं तेरी खुदाई पर
मेरी कश्ती जो तूफां मे फसी ना होती ||

- Unknown

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Tuesday, October 23, 2007

रफ्ता रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए
पहले जान फिर जाने जाँ फिर जाने जाना हो गए

दिन बदीन बढ़ती गयी इस हुस्न की रानाईयाँ
पहेले गुल फिर गुल बदन फिर गुल बदामा हो गए

आप तो नजदीक से नजदीक तर आते गए
पहले दिल फिर दिलरुबा फिर दिल के मेहमाँ हो गए

प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ़ मिट गए
आप से फिर तुम हुए फिर तू का उन्वां हो गए ||

गजल sung by Mehadi hassan .. Poet - no idea....

मनोज

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Tuesday, March 27, 2007

बाँवरा मन...

बाँवरा मन देखने चला एक सपना..
बाँवरा मन देखने चला एक सपना..

बाँवरे से मन की देखो बाँवरीं हैं बातें..
बाँवरे से मन की देखो बाँवरीं हैं बातें..

बाँवरीं सीं धड़कनें हैं, बाँवरीं हैं साँसें..
बाँवरीं सीं करवटों से नींदियाँ दूर भागे..
बाँवरे से नैंन चाहें, बाँवरे झरोखों से,
बाँवरे नज़ारों को तकना..

बाँवरा मन देखने चला एक सपना..

बाँवरे से इस जहाँ में, बाँवरा एक साथ हो..
इस सयानी भीड़ में बस हाथों में तेरा हाथ हो..
बाँवरीं सी धुन हो कोई, बाँवरा एक राग हो..
बाँवरीं सी धुन हो कोई, बाँवरा एक राग हो..
बाँवरे से पैर चाहैं, बाँवरे तरानों के,
बाँवरे से बोल पे थिरकना..

बाँवरा मन देखने चला एक सपना..

बाँवरा सा हो अँधेरा, बाँवरी खामोशियाँ..
बाँवरा सा हो अँधेरा, बाँवरी खामोशियाँ..
थरथराती लौह मद्धम, बाँवरी मदहोशियाँ..
बाँवरा एक घुँघटा चाहे, हौले हौले, बिन बताए..
बाँवरा एक घुँघटा चाहे, हौले हौले, बिन बताए..
बाँवरे से मुखड़े से सरकना..

बाँवरा मन देखने चला एक सपना..
बाँवरा मन देखने चला एक सपना..

Tuesday, July 18, 2006

आज तुम मेरे लिए हो

प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।

मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,
मैं समय के शाप से डरता नहीं अब,
आज कुंतल छाँह मुझपर तुम किए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।

रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,
वह सुधा के स्वाद से जाए छला क्या,
जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

मृत-सजीवन था तुम्हारा तो परस ही,
पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी,
मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

- हरिवंशराय बच्चन

Maktub - It is Written

The master says: “Close your eyes. Or even with your eyes open, imagine the following scene: a flock of birds on the wing. Now, tell me how many birds you saw: Five? Eleven? Sixteen?
Whatever the response -and it is difficult for someone to say how many birds were seen -one thing becomes quite clear in this small experiment. You can imagine a flock of birds, but the number of birds in the flock is beyond your control. Yet the scene was clear, well-defined, exact. There must be an answer to the question.
Who was it that determined how many birds should appear in the imagined scene? Not you!”